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डिफेंस कॉरिडोर घोटाले में IAS अभिषेक प्रकाश की मुश्किलें बढ़ीं

IAS Abhishek Prakash
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लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में डिफेंस कॉरिडोर परियोजना से जुड़े भूमि अधिग्रहण घोटाले ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। इस मामले में पूर्व जिलाधिकारी (डीएम) और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अभिषेक प्रकाश की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। उनके साथ-साथ कई अन्य अधिकारियों, जिनमें डीएम से लेकर तहसीलदार तक शामिल हैं, पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घोटाले को लेकर सख्त रुख अपनाया है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के संकेत दिए हैं। सूत्रों की मानें तो जल्द ही कई अधिकारियों का निलंबन हो सकता है, जिससे प्रशासनिक हलकों में खलबली मची हुई है।

यह घोटाला उस समय प्रकाश में आया जब डिफेंस कॉरिडोर के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आईं। जांच में पता चला कि अधिकारियों ने किसानों से सस्ते दामों में जमीन खरीदी और उसे ऊंची कीमत पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाया। इतना ही नहीं, इस प्रक्रिया में फर्जी पट्टों का इस्तेमाल कर करोड़ों रुपये के मुआवजे की भी हेराफेरी की गई। जांच रिपोर्ट के अनुसार, कुल 90 फर्जी पट्टे तैयार किए गए थे, जिसके जरिए सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया गया। इस मामले में अभिषेक प्रकाश, जो उस समय लखनऊ के डीएम थे, पर सीधे तौर पर उंगलियां उठ रही हैं। उनके कार्यकाल में हुई इन अनियमितताओं ने उनके करियर पर सवालिया निशान लगा दिया है।

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अभिषेक प्रकाश का प्रशासनिक सफर काफी चर्चित रहा है। 2006 बैच के इस आईएएस अधिकारी ने लखनऊ सहित कई जिलों में डीएम के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। हाल ही में वे इन्वेस्ट यूपी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के पद पर तैनात थे, लेकिन एक अन्य मामले में रिश्वतखोरी के आरोपों के बाद उन्हें निलंबित कर दिया गया था। अब डिफेंस कॉरिडोर घोटाले में उनकी संलिप्तता की जांच ने उनके लिए स्थिति को और जटिल बना दिया है। सूत्रों का कहना है कि इस घोटाले में शामिल अन्य अधिकारियों के नाम भी जल्द ही सामने आ सकते हैं, जिनमें तत्कालीन उपजिलाधिकारी (एसडीएम), तहसीलदार और राजस्व विभाग के कर्मचारी शामिल हैं।

 IAS अभिषेक प्रकाश
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जांच के दौरान यह भी खुलासा हुआ कि अधिकारियों ने न केवल फर्जी दस्तावेज तैयार किए, बल्कि मुआवजे की राशि को हड़पने के लिए किसानों के साथ धोखाधड़ी भी की। कई किसानों ने शिकायत की कि उनकी जमीन का अधिग्रहण तो कर लिया गया, लेकिन उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिला। दूसरी ओर, कुछ अधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों और करीबियों के नाम पर जमीनें खरीदकर मुआवजे की राशि को अपने खातों में डाल लिया। इस पूरे खेल में करीब 18 अधिकारियों के शामिल होने की बात सामने आई है, जिनमें से कुछ पर पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोप लग चुके हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले को गंभीरता से लिया है। उनके निर्देश पर गठित जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि इस घोटाले में बड़े पैमाने पर सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है। सीएम ने साफ कहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति है और दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। सूत्रों के मुताबिक, सरकार अब इन अधिकारियों से न केवल हड़पी गई राशि की वसूली करने की तैयारी में है, बल्कि उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे भी दर्ज किए जा सकते हैं। इसके अलावा, निलंबन की कार्रवाई को तेज करने के लिए एक विशेष टीम का गठन किया गया है, जो इस मामले की हर कड़ी को जोड़ रही है।

डिफेंस कॉरिडोर परियोजना उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है, जिसके तहत रक्षा क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देना और रोजगार सृजन करना लक्ष्य है। लेकिन इस घोटाले ने परियोजना की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस मामले में सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो इसका असर राज्य में निवेश के माहौल पर भी पड़ सकता है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह घोटाला भाजपा सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार का एक और उदाहरण है। उन्होंने अभिषेक प्रकाश के निलंबन पर तंज कसते हुए कहा कि वे शायद अभी भी सीएम कार्यालय में छिपे हुए हैं।

इस पूरे प्रकरण में जनता की नजर अब सरकार के अगले कदम पर टिकी है। लोगों का कहना है कि अगर दोषियों को सजा मिलती है तो यह भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा संदेश होगा। वहीं, प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी इस मामले ने भय का माहौल पैदा कर दिया है। कई अधिकारी अब अपनी पुरानी फाइलों को खंगाल रहे हैं, ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी से बचा जा सके।

कुल मिलाकर, डिफेंस कॉरिडोर घोटाला उत्तर प्रदेश की नौकरशाही के लिए एक सबक बन सकता है। अभिषेक प्रकाश जैसे वरिष्ठ अधिकारी पर लगे आरोपों ने यह साबित कर दिया है कि बड़े पद पर बैठे लोग भी कानून से ऊपर नहीं हैं। अब देखना यह है कि सरकार इस मामले में कितनी तेजी और पारदर्शिता से कार्रवाई करती है।

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Author: bharatkhabar

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