लखनऊ के KGMU में सर्जरी का काला खेल: मरीजों की मजबूरी का फायदा उठा रहे डीलर, मुफ्त इलाज के नाम पर लूट!

लखनऊ का किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू), जो उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं का एक बड़ा केंद्र माना जाता है, इन दिनों एक बड़े घोटाले की चपेट में है। यहाँ के लिवर सेंटर में सर्जिकल उपकरणों की खरीद में गड़बड़ी का सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने मरीजों और उनके परिजनों को हैरान कर दिया है। गरीब और मजबूर मरीज, जो मुफ्त इलाज की उम्मीद में यहाँ आते हैं, उन्हें सर्जरी के नाम पर हजारों रुपये खर्च करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या यहाँ मरीजों की जान बचाने की जगह उनकी जेब पर डAKA डाला जा रहा है?
KGMU मामला क्या है?
केजीएमयू के लिवर सेंटर में सर्जरी के लिए जरूरी उपकरणों की खरीद में एक बड़ा खेल चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक, डीलरों को पहले से ही पता होता है कि किस मरीज को कौन से सर्जिकल उपकरणों की जरूरत होगी। हैरानी की बात यह है कि ये डीलर सीधे ऑपरेशन थिएटर (ओटी) तक उपकरण पहुंचा रहे हैं। मरीजों को सर्जरी से पहले ही बता दिया जाता है कि उन्हें ये उपकरण खुद खरीदने होंगे, जिनकी कीमत 5 हजार से लेकर 11 हजार रुपये तक हो सकती है। सिद्धार्थनगर, बाराबंकी, हरदोई और लखीमपुर खीरी जैसे दूरदराज के इलाकों से आए मरीज इस लूट का सबसे ज्यादा शिकार हो रहे हैं।
KGMU मरीजों की आपबीती: मुफ्त सर्जरी का सपना टूटा
32 वर्षीय ममता राय, जो लखनऊ के बंगला बाजार की रहने वाली हैं, अपने 5 साल के बेटे की सर्जरी के लिए केजीएमयू आई थीं। ममता को उम्मीद थी कि यह सर्जरी मुफ्त होगी, जैसा कि अस्पताल में दावा किया जाता है। लेकिन सर्जरी के दौरान उन्हें 5 से 6 हजार रुपये खर्च करने पड़े। ममता ने बताया, “हमें बार-बार ओटी में बुलाकर अलग-अलग उपकरण खरीदने के लिए कहा गया। हमारे पास कोई चारा नहीं था, क्योंकि बच्चे की जान दांव पर थी।” ममता की तरह ही कई मरीजों ने इस तरह की शिकायतें की हैं, जिनमें सर्जरी के नाम पर उनसे पैसे वसूले गए।
जांच के नाम पर खानापूर्ति ?
जब इस गड़बड़ी की शिकायतें केजीएमयू के वाइस चांसलर प्रो. सोनिया नित्यानंद तक पहुंचीं, तो उन्होंने तुरंत एक चार सदस्यीय जांच कमिटी गठित की। इस कमिटी की अध्यक्षता सर्जरी डिपार्टमेंट के हेड प्रो. एके सिंह कर रहे हैं, और इसमें एनेस्थेसिया, माइक्रोबायोलॉजी और ओर्थोपेडिक डिपार्टमेंट के विशेषज्ञ शामिल हैं। कमिटी को जल्द से जल्द अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जांच सिर्फ खानापूर्ति है, या वाकई में दोषियों पर कार्रवाई होगी? मरीजों का कहना है कि ऐसी जांच पहले भी हो चुकी हैं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।
सर्जरी के नाम पर लूट का सिलसिला

सूत्रों के मुताबिक, लिवर सेंटर में यह गड़बड़ी लंबे समय से चल रही है। एक्सपर्ट टीम ने सोमवार से बुधवार तक ओटी के बाहर नजर रखी और पाया कि सिद्धार्थनगर, बाराबंकी, हरदोई और लखीमपुर खीरी से आए मरीजों को बार-बार ओटी में बुलाकर सर्जिकल उपकरण खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। एक मरीज ने बताया, “हमें 11 हजार रुपये का एक उपकरण खरीदने के लिए कहा गया। जब हमने मना किया, तो हमें धमकी दी गई कि सर्जरी नहीं होगी।” यह सिलसिला सिर्फ लिवर सेंटर तक सीमित नहीं है, बल्कि मैटरनिटी वार्ड में भी ऐसी शिकायतें सामने आई हैं।
मैटरनिटी वार्ड में भी गड़बड़ी
मैटरनिटी वार्ड-3 के बेड नंबर-2 और 3 पर भर्ती मरीजों ने भी अपनी आपबीती सुनाई। एक मरीज ने बताया कि उनकी सर्जरी के बाद भी उन्हें बार-बार उपकरणों के लिए पैसे देने पड़े। मरीजों का कहना है कि मुफ्त सर्जरी का दावा सिर्फ कागजों तक सीमित है, हकीकत में उन्हें अपनी जेब ढीली करनी पड़ रही है।
अस्पताल प्रशासन का रवैया
इस पूरे मामले पर सेंट्रल सर्जरी हॉस्पिटल की सीएमएस डॉ. नित्या का कहना है, “अस्पताल में सर्जरी के लिए मुफ्त में उपकरण लगाए जाने हैं। किसी भी मरीज से वसूली की शिकायत नहीं होनी चाहिए।” लेकिन उनके इस बयान और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। मरीजों का कहना है कि अस्पताल प्रशासन इस मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है, ताकि इसकी बदनामी बाहर न जाए।
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क्या है इस घोटाले का असली मकसद?
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे खेल में डीलरों और कुछ अस्पताल कर्मचारियों की मिलीभगत है। डीलरों को पहले से ही मरीजों की जानकारी दे दी जाती है, जिसके बाद वे ओटी तक उपकरण पहुंचाते हैं। इन उपकरणों की कीमत बाजार से कई गुना ज्यादा होती है, और मरीजों के पास इन्हें खरीदने के अलावा कोई चारा नहीं होता। इस तरह डीलर और कुछ कर्मचारी मोटा मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है।
मरीजों की मजबूरी और सिस्टम की नाकामी

केजीएमयू जैसे बड़े अस्पताल में इस तरह की गड़बड़ी न सिर्फ मरीजों के भरोसे को तोड़ती है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सिस्टम पर सवाल खड़े करती है। गरीब मरीज, जो अपनी आखिरी उम्मीद लेकर यहाँ आते हैं, उन्हें लूट का शिकार बनाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या सरकार और अस्पताल प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेगा, या यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा?
केजीएमयू में सर्जरी के नाम पर चल रहा यह काला खेल न सिर्फ मरीजों के लिए बल्कि पूरे स्वास्थ्य सिस्टम के लिए एक बड़ा खतरा है। जरूरत है इस मामले की गहन जांच की और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की। मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाना एक गंभीर अपराध है, और इसे रोकने के लिए तुरंत कदम उठाए जाने चाहिए।
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