“जल जीवन मिशन पर सवाल: एक नल कनेक्शन की कीमत 30,000 से बढ़कर 1.37 लाख, सरकार से स्पष्टीकरण की मांग”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 15 अगस्त 2019 को लॉन्च की गई जल जीवन मिशन (जेजेएम), जिसका उद्देश्य 2024 तक देश के हर ग्रामीण परिवार को नल के माध्यम से सुरक्षित और पर्याप्त पेयजल उपलब्ध कराना था, अब विवादों के घेरे में है। इस महत्वाकांक्षी योजना की लागत में 350% की भारी बढ़ोतरी ने केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय को सवाल उठाने के लिए मजबूर कर दिया है। वित्त मंत्रालय ने जल शक्ति मंत्रालय से पूछा है कि एक नल कनेक्शन की लागत 2019 में 30,000 रुपये से बढ़कर अब 1,37,500 रुपये क्यों हो गई। इसके साथ ही, मिशन का लक्ष्य पूरा करने की समय सीमा को 2024 से बढ़ाकर 2028 कर दिया गया है, जिसने इस योजना की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं।

जल जीवन मिशन का सफर: उपलब्धियां और चुनौतियां
जल जीवन मिशन को ग्रामीण भारत में पेयजल संकट को हल करने के लिए एक क्रांतिकारी कदम माना गया था। इस योजना का लक्ष्य 19.26 करोड़ ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन प्रदान करना था। 2019 में शुरू होने के समय, केवल 3.23 करोड़ (17%) ग्रामीण परिवारों के पास नल कनेक्शन थे। दिसंबर 2024 तक, सरकार ने 12.17 करोड़ परिवारों (लगभग 75%) को नल कनेक्शन प्रदान किए, जो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। हालांकि, 3.96 करोड़ परिवार अभी भी इस सुविधा से वंचित हैं, और इन परिवारों को कनेक्शन देने के लिए जल शक्ति मंत्रालय ने 2028 तक का समय मांगा है।
लागत में वृद्धि का कारण: वित्त मंत्रालय की चिंता
जल शक्ति मंत्रालय ने जेजेएम की कुल लागत को संशोधित करते हुए 9.10 लाख करोड़ रुपये का प्रस्ताव रखा है, जिसमें केंद्र का हिस्सा 2.79 लाख करोड़ रुपये और राज्यों का हिस्सा 2.71 लाख करोड़ रुपये होगा। 2019 में इस मिशन का कुल बजट 3.60 लाख करोड़ रुपये था, जिसमें केंद्र का हिस्सा 2.08 लाख करोड़ रुपये और राज्यों का हिस्सा 1.52 लाख करोड़ रुपये था। अब, शेष 4 करोड़ परिवारों को कनेक्शन देने के लिए अतिरिक्त 5.5 लाख करोड़ रुपये की जरूरत बताई जा रही है।
वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) ने इस लागत वृद्धि पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जल शक्ति मंत्रालय को प्रति कनेक्शन लागत में इतनी भारी बढ़ोतरी का विस्तृत औचित्य देना होगा। डीईए ने यह भी पूछा है कि लागत वृद्धि के लिए जिम्मेदार कारकों, जैसे कि सामग्री की कीमतों में वृद्धि, श्रम लागत, या अन्य परियोजना खर्चों को स्पष्ट किया जाए। मंत्रालय ने लागत वृद्धि को “टेंडर प्रीमियम” से जोड़ा है, जो सरकार के निर्धारित दरों और वास्तविक टेंडर लागत के बीच का अंतर है। हालांकि, वित्त मंत्रालय ने इस जवाब को अपर्याप्त माना है।
टेंडर प्रीमियम और पारदर्शिता पर सवाल
जल शक्ति मंत्रालय ने दावा किया है कि विभिन्न कारणों, जैसे कि सामग्री और श्रम लागत में वृद्धि, परियोजना में देरी, और क्षेत्रीय चुनौतियों के कारण लागत बढ़ी है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि टेंडर प्रीमियम को जल शक्ति मंत्री की मंजूरी के बाद लागू किया गया है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी लागत वृद्धि के लिए केवल टेंडर प्रीमियम को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। कुछ विश्लेषकों ने परियोजना में कुप्रबंधन, ठेकेदारों के साथ अनुबंधों में पारदर्शिता की कमी, और राज्यों के बीच समन्वय की कमी को भी इसकी वजह बताया है।
राज्यों की भूमिका और क्षेत्रीय चुनौतियां
जल जीवन मिशन में केंद्र और राज्यों के बीच लागत का बंटवारा 50:50 (सामान्य राज्यों के लिए) और 90:10 (उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों के लिए) है। कुछ राज्यों, जैसे केरल, ने इस योजना को महत्वपूर्ण मानते हुए अपनी हिस्सेदारी समय पर जारी की है, लेकिन वहां भी प्रगति धीमी रही है। राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में स्थानीय भूजल स्तर, बुनियादी ढांचे की कमी, और प्रशासनिक देरी ने मिशन को प्रभावित किया है। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती रही है। मिशन के तहत प्रत्येक गांव में पांच महिलाओं को पानी की गुणवत्ता जांचने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, जो 12 प्रकार के प्रदूषकों, जैसे फॉस्फेट, सल्फेट, और टर्बिडिटी, की जांच करती हैं।
मिशन का प्रभाव और सामाजिक लाभ
जल जीवन मिशन ने ग्रामीण भारत में कई सकारात्मक बदलाव लाए हैं। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी.के. पॉल के अनुसार, सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता ने डायरिया से होने वाली लगभग 4 लाख मौतों को रोकने की क्षमता दिखाई है। यह मिशन न केवल स्वास्थ्य सुधार में योगदान दे रहा है, बल्कि महिलाओं और लड़कियों को पानी लाने के बोझ से मुक्ति देकर उनके जीवन को आसान बना रहा है। 2024 तक, मिशन ने 77.98% ग्रामीण परिवारों को नल कनेक्शन प्रदान किए, जिससे 15.07 करोड़ से अधिक परिवार लाभान्वित हुए हैं।
वित्तीय आवंटन और भविष्य की योजना
2025-26 के लिए वित्त मंत्रालय ने जेजेएम के लिए 67,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इससे पहले, 2021-22 में 50,000 करोड़ रुपये और 2023 में 69,684 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया था। सरकार का कहना है कि मिशन को पूरा करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर काम कर रही हैं, लेकिन लागत वृद्धि और समय सीमा में विस्तार ने विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का मौका दिया है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि मिशन में वित्तीय अनियमितताएं और कुप्रबंधन है, जिसके कारण लागत में इतनी भारी वृद्धि हुई।
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया
जल जीवन मिशन की लागत वृद्धि ने सोशल मीडिया पर भी तीखी बहस छेड़ दी है। कुछ यूजर्स ने सरकार से पारदर्शिता की मांग की है, जबकि अन्य ने मिशन की उपलब्धियों की सराहना की है। एक यूजर ने लिखा, “जल जीवन मिशन ने लाखों परिवारों को स्वच्छ पानी दिया, लेकिन लागत में 350% की वृद्धि समझ से परे है।” एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, “यह सरकार की नाकामी है कि इतना महत्वपूर्ण मिशन समय पर पूरा नहीं हुआ।” विपक्षी नेता इस मुद्दे को 2024 के आम चुनावों के बाद भी उठा रहे हैं, जिससे यह सियासी रंग ले रहा है।
जल जीवन मिशन ग्रामीण भारत के लिए एक जीवन रेखा है, लेकिन लागत वृद्धि और समय सीमा में देरी ने इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को परियोजना प्रबंधन में सुधार, टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता, और राज्यों के साथ बेहतर समन्वय पर ध्यान देना होगा। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के अनुरूप, सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि मिशन का लाभ हर ग्रामीण परिवार तक पहुंचे। अगले चार वर्षों में शेष 4 करोड़ परिवारों को नल कनेक्शन प्रदान करना एक बड़ी चुनौती होगी, लेकिन यह मिशन देश के स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।
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