वक्फ संशोधन विधेयक 2025 को लेकर देश की सियासत में उथल-पुथल मची हुई है। यह विधेयक, जिसे वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में सुधार और पारदर्शिता लाने के लिए पेश किया गया है, पहले ही लोकसभा में पारित हो चुका है और अब राज्यसभा में चर्चा के दौर से गुजर रहा है। इस बीच, बीजू जनता दल (BJD) ने अपने सांसदों को इस विधेयक पर अपने विवेक के आधार पर वोट करने की आजादी देकर राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। पार्टी ने इस मुद्दे पर कोई व्हिप जारी नहीं किया है, जिसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को मिल सकता है।
BJD का यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला है, क्योंकि ओडिशा की यह क्षेत्रीय पार्टी पहले इस विधेयक के खिलाफ खुलकर सामने आई थी। अब सांसदों को स्वतंत्रता देने के इस कदम को राजनीतिक यू-टर्न के तौर पर देखा जा रहा है। BJD के प्रवक्ता सस्मित पात्रा ने कहा, “हमारी पार्टी धर्मनिरपेक्षता और समावेशिता में विश्वास रखती है। अपने सांसदों को विवेक से फैसला लेने की छूट देकर हम अल्पसंख्यक समुदायों की भावनाओं का सम्मान कर रहे हैं।” BJD के इस फैसले से उसके सात राज्यसभा सांसदों के वोट विधेयक के भविष्य को तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
वक्फ संशोधन विधेयक का मकसद वक्फ बोर्डों के कामकाज को बेहतर करना, संपत्तियों के दुरुपयोग पर लगाम लगाना और प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे पेश करते हुए कहा, “यह विधेयक किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। इसका उद्देश्य संपत्तियों का सही प्रबंधन और सभी वर्गों का कल्याण है।”
सरकार का दावा है कि यह कदम प्रशासनिक सुधार की दिशा में उठाया गया है”

हालांकि, विपक्षी दल इस विधेयक को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए हैं। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे दलों ने इसे ‘मुस्लिम विरोधी’ और ‘असंवैधानिक’ करार दिया है। कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने राज्यसभा में कहा, “यह विधेयक सुधार की आड़ में मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर हमला है। सरकार का मकसद धार्मिक ध्रुवीकरण करना है।” विपक्ष का आरोप है कि यह विधेयक अल्पसंख्यकों की भावनाओं को आहत कर सकता है।
BJD के इस अप्रत्याशित कदम ने विपक्षी खेमे में बेचैनी बढ़ा दी है, वहीं NDA के लिए यह एक सुनहरा मौका बन गया है। राज्यसभा में विधेयक को पास करने के लिए 119 वोटों की जरूरत है। NDA के पास अभी 125 सांसद हैं, और BJD के सात सांसदों का समर्थन उनकी स्थिति को और मजबूत कर सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BJD का यह फैसला ओडिशा में भाजपा के साथ संबंधों को संतुलित करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
इस घटनाक्रम ने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक बहस छेड़ दी है। जहां कुछ लोग BJD के फैसले को साहसिक बता रहे हैं, वहीं कई इसे अवसरवादी कदम करार दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाने की संभावना है, क्योंकि विपक्ष इसे रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है।
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