देश के शीर्ष कॉलेजों में दलित-आदिवासी प्रतिनिधित्व की चौंकाने वाली सच्चाई: सरकार का जवाब अधूरा
नई दिल्ली: भारत के प्रतिष्ठित कॉलेजों और उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित और आदिवासी समुदायों के छात्रों की भागीदारी को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। हाल ही में संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्र सरकार ने जो आंकड़े पेश किए, वे इन समुदायों की शिक्षा में मौजूद गहरी खाई को उजागर करते हैं। सरकार ने स्वीकार किया कि देश के कुछ सबसे बड़े और नामी संस्थानों में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों का प्रतिनिधित्व बेहद कम है, लेकिन इस समस्या के समाधान के लिए कोई ठोस कदम उठाने की बात स्पष्ट नहीं की गई।
संसद में यह सवाल कांग्रेस सांसद ज्योत्सना महंत ने उठाया था, जिसमें उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या देश के शीर्ष कॉलेजों में दलित और आदिवासी छात्रों की संख्या उनकी जनसंख्या के अनुपात में है। जवाब में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आंकड़े पेश किए, जिनके अनुसार कई प्रमुख संस्थानों में इन समुदायों के छात्रों की संख्या न केवल अपेक्षा से कम है, बल्कि कुछ जगहों पर तो यह शून्य के करीब है। मंत्रालय ने कहा कि आरक्षण नीति के तहत सीटें तो आवंटित की जाती हैं, लेकिन इन सीटों को भरने में कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आती हैं। हालांकि, इन चुनौतियों का विस्तृत ब्योरा या समाधान का कोई रोडमैप सरकार की ओर से नहीं दिया गया।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति देश में शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त गहरी असमानता को दर्शाती है। उनका मानना है कि केवल आरक्षण लागू करना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में स्कूली शिक्षा को मजबूत करने, जागरूकता बढ़ाने और आर्थिक सहायता प्रदान करने जैसे कदम उठाने होंगे। एक विशेषज्ञ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कई बार इन समुदायों के छात्रों को सामाजिक भेदभाव और आर्थिक तंगी के कारण उच्च शिक्षा तक पहुंचने में बाधा आती है। इसके अलावा, प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए होने वाली कठिन परीक्षाओं की तैयारी के लिए संसाधनों की कमी भी एक बड़ी वजह है।

आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति और भी चिंताजनक दिखती है। उदाहरण के लिए, कुछ आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में एससी और एसटी छात्रों की संख्या कुल नामांकन के 5% से भी कम है, जबकि इन समुदायों की जनसंख्या देश में क्रमशः 16.6% और 8.6% है। इसी तरह, मेडिकल कॉलेजों और अन्य शीर्ष विश्वविद्यालयों में भी इन समुदायों का प्रतिनिधित्व बेहद कम है। सरकार ने अपने जवाब में यह भी कहा कि वह इन आंकड़ों को बेहतर करने के लिए छात्रवृत्ति और विशेष कोचिंग जैसी योजनाएं चला रही है, लेकिन विपक्ष ने इसे “खानापूर्ति” करार दिया।
कांग्रेस सांसद ज्योत्सना महंत ने सरकार के जवाब को “अधूरा और असंतोषजनक” बताते हुए कहा कि यह केवल आंकड़ों का खेल है, जिसमें जमीनी हकीकत को नजरअंदाज किया गया है। उन्होंने मांग की कि सरकार को इस मुद्दे पर एक व्यापक नीति बनानी चाहिए, जिसमें न केवल छात्र बल्कि इन छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के लिए जरूरी सहायता भी शामिल हो। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं ने दावा किया कि मौजूदा सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के क्षेत्र में समावेशिता को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए हैं, और स्थिति पहले से बेहतर हुई है।
इस बीच, दलित और आदिवासी संगठनों ने इस मुद्दे को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि सरकार की नीतियां केवल कागजों तक सीमित हैं और वास्तविक बदलाव के लिए इन समुदायों की आवाज को नीति निर्माण में शामिल करना होगा। इस खबर ने एक बार फिर शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय के सवाल को गरम कर दिया है, और आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से सड़क तक चर्चा का विषय बन सकता है।
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