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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: बेटियों को विरासत से वंचित करने की साजिश नाकाम।

 

सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में दत्तक ग्रहण दस्तावेज (एडॉप्शन डीड) को खारिज करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि इस दस्तावेज का उद्देश्य बेटियों को उनकी पैतृक संपत्ति में वैध हिस्सेदारी से वंचित करना था। यह फैसला न केवल बेटियों के संपत्ति अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि सामाजिक स्तर पर लैंगिक समानता को बढ़ावा देने वाला भी है।

मामला मध्य प्रदेश के एक परिवार से जुड़ा है, जहां पिता ने अपनी मृत्यु से पहले एक दत्तक पुत्र को गोद लेने का दस्तावेज तैयार किया था। इस दस्तावेज के आधार पर दत्तक पुत्र ने संपत्ति पर पूर्ण अधिकार का दावा किया, जिससे परिवार की बेटियों को उनकी विरासत से वंचित करने की कोशिश की गई। बेटियों ने इस दस्तावेज को चुनौती देते हुए निचली अदालत में मुकदमा दायर किया, जहां से मामला हाई कोर्ट और अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अभय एस. ओका शामिल थे, ने इस मामले की गहन जांच की। कोर्ट ने पाया कि दत्तक ग्रहण का दस्तावेज संदिग्ध परिस्थितियों में तैयार किया गया था और इसका प्राथमिक मकसद बेटियों को संपत्ति में हिस्सा देने से रोकना था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, “दत्तक ग्रहण एक पवित्र प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य परिवार को संतान सुख प्रदान करना है, न कि संपत्ति हस्तांतरण के लिए इसका दुरुपयोग करना।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत बेटियों को पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार प्राप्त है। 2005 के संशोधन के बाद यह अधिकार और मजबूत हुआ है, जिसके तहत बेटियों को पुत्रों के समान ही संपत्ति में हिस्सा मिलता है। कोर्ट ने इस मामले में दस्तावेज को “कपटपूर्ण” करार देते हुए इसे रद्द कर दिया और बेटियों को उनकी वैध हिस्सेदारी प्रदान करने का आदेश दिया।

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इस फैसले ने सामाजिक और कानूनी हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। महिला अधिकार संगठनों ने इसे बेटियों के लिए एक बड़ी जीत बताया है। नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन (NFIW) की महासचिव एनी राजा ने कहा, “यह फैसला उन परिवारों के लिए एक चेतावनी है जो पुरुषवादी सोच के तहत बेटियों को उनके हक से वंचित करने की कोशिश करते हैं।” उन्होंने कोर्ट के इस कदम को लैंगिक समानता की दिशा में मील का पत्थर बताया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में इसी तरह के मामलों के लिए एक मिसाल कायम करेगा। वरिष्ठ अधिवक्ता रंजना कुमारी ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संपत्ति के लिए दत्तक ग्रहण जैसे पवित्र रीति-रिवाजों का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह बेटियों के आत्मविश्वास को बढ़ाने वाला फैसला है।”

हालांकि, कुछ लोगों ने इस फैसले पर सवाल भी उठाए हैं। मामले से जुड़े दत्तक पुत्र के वकील ने तर्क दिया कि दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया वैध थी और इसे संपत्ति विवाद से जोड़ना अनुचित है। उन्होंने कहा कि इस फैसले से दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया पर अनावश्यक संदेह पैदा हो सकता है।

यह मामला समाज में गहरे बैठे लैंगिक भेदभाव को भी उजागर करता है, जहां बेटियों को अक्सर संपत्ति में हिस्सा देने से रोका जाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल कानूनी दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक बदलाव की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।

 

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