उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय, जो राज्य की आबादी का लगभग 21 प्रतिशत हिस्सा है, एक बार फिर सियासी दलों के लिए केंद्रबिंदु बन गया है। डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और समाजवादी पार्टी (सपा) ने दलित वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए नए सिरे से प्रयास शुरू किए हैं। यह सियासी हलचल हाल ही में सपा के एक दलित सांसद द्वारा राजपूत राजा राणा सांगा के खिलाफ की गई टिप्पणी से उपजे विवाद के बाद और तेज हो गई है, जिसने यूपी की राजनीति में दलित मतदाताओं की अहमियत को फिर से रेखांकित किया है।
लखनऊ में अंबेडकर जयंती के मौके पर दोनों पार्टियों ने अपनी रणनीतियों को धार दी। बीजेपी ने दलित समुदाय के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए 13 दिनों तक चलने वाले विशेष कार्यक्रमों की शुरुआत की। इनमें शोभायात्राएं, सामाजिक जागरूकता अभियान, और अंबेडकर के संदेशों को जन-जन तक पहुंचाने वाले सांस्कृतिक आयोजन शामिल हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए कि वे दलितों के बीच जाकर “गलत सूचनाओं” का खंडन करें और बीजेपी की नीतियों को स्पष्ट करें। योगी ने एक सभा में कहा, “जो लोग दलितों को गुमराह कर अपनी सियासत चमकाते हैं, उन्हें सच का सामना करना होगा। हम अंबेडकर के सपनों को साकार करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”
बीजेपी ने दलित वोटरों को लुभाने के लिए कई योजनाओं पर जोर दिया, जैसे कि मुफ्त कोचिंग, स्कॉलरशिप, और स्वरोजगार के अवसर, जो खास तौर पर पिछड़े और दलित समुदायों के लिए हैं। आगरा से बीजेपी के राज्य मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने लखनऊ में एक पदयात्रा का नेतृत्व किया, जिसमें दलित समुदाय की समस्याओं को सुनने और उनके लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराने पर जोर दिया गया। बीजेपी का दावा है कि उनकी सरकार ने दलितों के लिए शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक सम्मान को बढ़ावा देने में अभूतपूर्व काम किया है।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने भी दलितों को अपने पाले में लाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अंबेडकर जयंती पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा, “हम बाबासाहेब के संविधान को बदलने की किसी भी साजिश को कामयाब नहीं होने देंगे। सपा हमेशा दलितों और वंचितों के साथ खड़ी है।” अखिलेश ने बीजेपी पर दलित विरोधी नीतियों का आरोप लगाते हुए कहा कि योगी सरकार की बुलडोजर नीति ने दलित और गरीब समुदायों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है।

सपा को हाल ही में एक बड़ा बढ़ावा तब मिला, जब बीएसपी के संस्थापक सदस्य दादू प्रसाद ने अखिलेश की मौजूदगी में सपा का दामन थाम लिया। यह कदम सपा की उस रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत वह बीएसपी के परंपरागत दलित वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। सपा ने भी अंबेडकर जयंती पर कई जिलों में रैलियां और सभाएं आयोजित कीं, जिसमें दलित समुदाय के युवाओं को जोड़ने पर विशेष ध्यान दिया गया।
इस सियासी जंग की पृष्ठभूमि में सपा सांसद अवधेश प्रसाद की ओर से राणा सांगा पर की गई टिप्पणी ने नया मोड़ ला दिया। इस टिप्पणी को बीजेपी ने दलित-राजपूत तनाव का हथियार बनाया और सपा पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का आरोप लगाया। जवाब में, सपा ने दावा किया कि बीजेपी इस मुद्दे को तूल देकर दलितों को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। इस विवाद ने दोनों पार्टियों को दलित मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति मजबूत करने का एक और मौका दे दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में दलित वोट निर्णायक भूमिका निभाएंगे। दलित समुदाय परंपरागत रूप से बीएसपी का वोट बैंक रहा है, लेकिन बीएसपी की कमजोर होती पकड़ ने बीजेपी और सपा के लिए नई संभावनाएं खोल दी हैं। बीजेपी जहां अपनी हिंदुत्व की छवि के साथ दलित कल्याण योजनाओं को जोड़ रही है, वहीं सपा सामाजिक न्याय और संविधान की रक्षा के मुद्दे को उठाकर दलितों को लुभाने की कोशिश में है।
सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा छाया हुआ है। जहां बीजेपी समर्थक योगी सरकार की योजनाओं को दलित उत्थान का प्रतीक बता रहे हैं, वहीं सपा समर्थकों का कहना है कि अखिलेश की नीतियां दलितों के लिए ज्यादा समावेशी हैं। इस बीच, कई दलित संगठनों ने दोनों पार्टियों से ठोस नीतियों की मांग की है, ताकि अंबेडकर के सपनों को वास्तव में साकार किया जा सके।
यह सियासी गोलबंदी न केवल दलित समुदाय के महत्व को दर्शाती है, बल्कि यूपी की राजनीति में अंबेडकर की विरासत के इर्द-गिर्द होने वाली जटिल रणनीतियों को भी उजागर करती है। जैसे-जैसे 2027 का चुनाव नजदीक आएगा, यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी और सपा में से कौन दलित वोटरों का दिल जीत पाता है।
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