” संविधान या सियासत? वक्फ संशोधन कानून को लेकर कांग्रेस-BJP में तीखी जंग, उभरे गंभीर सवाल”
भारत की संसद में हाल ही में पारित वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 ने देश की सियासत में भूचाल ला दिया है। इस कानून को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और विपक्षी दल कांग्रेस के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिल रही है। जहां कांग्रेस ने इस कानून को “संविधान पर हमला” और “इस्लामोफोबिक” करार देते हुए इसे मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर कुठाराघात बताया है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और BJP ने इसे पारदर्शिता और सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम ठहराया है। इस मुद्दे ने न केवल संसद बल्कि देश भर में व्यापक बहस छेड़ दी है।

वक्फ संशोधन अधिनियम: क्या है पूरा मामला?
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को संसद के दोनों सदनों ने अप्रैल 2025 में मंजूरी दी थी। इसे पहले वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 के रूप में अगस्त 2024 में लोकसभा में पेश किया गया था। यह विधेयक वक्फ अधिनियम, 1995 में संशोधन करने के लिए लाया गया, जिसका उद्देश्य वक्फ बोर्डों के कामकाज में पारदर्शिता, तकनीकी उन्नति और बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करना था। विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया, जिसने अपनी सिफारिशों के बाद इसे अंतिम रूप दिया।
कानून के प्रमुख प्रावधानों में शामिल हैं:
1. वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम और मुस्लिम महिलाओं को शामिल करना।
2. वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण और प्रबंधन के लिए डिजिटल तकनीक का उपयोग।
3. संपत्ति विवादों में जिला कलेक्टर को सर्वेक्षण का अधिकार देना।
4. वक्फ संपत्तियों की घोषणा के लिए वैध दस्तावेजों की अनिवार्यता।
5. पुराने कानून में मौजूद कुछ कानूनी खामियों को दूर करना।
केंद्र सरकार और BJP का दावा है कि यह कानून विशेष रूप से गरीब मुस्लिमों, पासमांदा समुदाय और मुस्लिम महिलाओं के हित में है। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा, “यह कानून वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकेगा और करोड़ों मुस्लिमों को लाभ पहुंचाएगा। यह किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि पारदर्शिता के लिए है।”
कांग्रेस का हमला: “संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रहार”
कांग्रेस ने इस कानून का पुरजोर विरोध किया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इसे “संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला” करार दिया। अहमदाबाद में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (AICC) की बैठक में राहुल ने कहा, “वक्फ अधिनियम BJP की ध्रुवीकरण की रणनीति का हिस्सा है। यह कानून मुस्लिम समुदाय को हाशिए पर धकेलने की साजिश है। RSS के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइजर’ में छपे लेख से साफ है कि अगला निशाना ईसाई और सिख समुदाय होंगे।”
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी इस कानून को “मुसलमानों को परेशान करने वाला” बताया। उन्होंने कहा, “1995 का वक्फ कानून पूरी तरह ठीक था। BJP ने इसे बदलकर अनावश्यक समस्याएं पैदा की हैं। यह कानून संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन करता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।” खड़गे ने यह भी दावा किया कि कानून में जिला कलेक्टर को सर्वेक्षण का अधिकार देने से वक्फ बोर्डों की स्वायत्तता खत्म हो जाएगी।
कांग्रेस की ओर से भोपाल के विधायक आरिफ मसूद ने मध्य प्रदेश में इस कानून के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया। मसूद ने कहा, “जब तक केंद्र सरकार इस कानून को वापस नहीं लेती, हमारा आंदोलन जारी रहेगा। यह मुस्लिम समुदाय पर थोपा गया है।”
BJP का पलटवार: “कांग्रेस की तुष्टिकरण की सियासत”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए हरियाणा के हिसार में एक रैली में कहा, “कांग्रेस ने वक्फ कानून को अपनी वोटबैंक की सियासत का हथियार बनाया। 2013 में उन्होंने वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार देकर जमीन माफियाओं को फायदा पहुंचाया। हमारा कानून गरीब मुस्लिमों, दलितों और पिछड़ों के हक की रक्षा करता है।”
मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए सवाल उठाया, “अगर कांग्रेस को मुस्लिमों की इतनी चिंता है, तो उसने कभी मुस्लिम को अपना अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया? लोकसभा चुनाव में 50% टिकट मुस्लिमों को क्यों नहीं दिए?” उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने कभी भी धर्म के आधार पर आरक्षण की वकालत नहीं की थी, लेकिन कांग्रेस ने वक्फ कानून को संविधान से ऊपर रखने की कोशिश की।
BJP सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने राज्यसभा में बहस के दौरान कहा, “यह कानून शराफत अली के लिए है, न कि शरारत खान के लिए। हम गरीब मुस्लिमों के साथ खड़े हैं, न कि कट्टरपंथी ठेकेदारों के साथ।” पार्टी ने यह भी दावा किया कि इस कानून से वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग करने वाले माफियाओं पर लगाम लगेगी।
संसद में तीखी बहस और विरोध
वक्फ (संशोधन) विधेयक पर लोकसभा और राज्यसभा में घंटों चली बहस के दौरान माहौल बेहद तनावपूर्ण रहा। लोकसभा में विधेयक को 288-232 वोटों से पारित किया गया, जबकि राज्यसभा में इसे 128-95 वोटों से मंजूरी मिली। बहस के दौरान ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तिहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने विधेयक की प्रति फाड़ दी और इसे “असंवैधानिक” बताया। ओवैसी ने कहा, “यह कानून मस्जिदों और कब्रिस्तानों पर सरकारी कब्जे की साजिश है। BJP मंदिर-मस्जिद के नाम पर समाज को बांटना चाहती है।”
वहीं, कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया। दूसरी ओर, BJP सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा, “वक्फ बोर्ड कोई संवैधानिक संस्था नहीं है। यह एक वैधानिक निकाय है, जिसका गलत इस्तेमाल हुआ है। हमारा कानून इसे सुधारने के लिए है।”
मुस्लिम समुदाय और अन्य संगठनों की प्रतिक्रिया
वक्फ कानून को लेकर मुस्लिम संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। AIMPLB ने कहा, “यह कानून मुस्लिम समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को छीनता है। वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन हमारा आंतरिक मामला है।”
दूसरी ओर, केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (KCBC) ने इस कानून का समर्थन किया। KCBC ने कहा कि यह कानून मुन्नमबम भूमि विवाद जैसे मामलों को सुलझाने में मदद करेगा, जहां वक्फ बोर्ड ने गलत तरीके से संपत्तियों पर दावा किया था। हालांकि, कुछ ईसाई नेताओं ने आशंका जताई कि भविष्य में उनकी संपत्तियों को भी निशाना बनाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और भविष्य
कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 10 से अधिक याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और AIMPLB जैसी पार्टियां शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभाव करता है और अन्य धार्मिक संगठनों के लिए समान प्रतिबंध लागू नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट अगले सप्ताह इन याचिकाओं पर सुनवाई शुरू कर सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकता है, जहां BJP और विपक्ष दोनों ही अपने-अपने वोटबैंकों को मजबूत करने की कोशिश में हैं। विश्लेषक सुब्हाषिनी अली ने कहा, “BJP इस कानून के जरिए ध्रुवीकरण की कोशिश कर रही है, लेकिन इसका उल्टा असर भी हो सकता है।”
जनता की राय और सामाजिक प्रभाव
इस कानून को लेकर जनता में मिली-जुली प्रतिक्रिया है। दिल्ली के एक शिक्षक मोहम्मद शफी ने कहा, “वक्फ बोर्डों में भ्रष्टाचार की शिकायतें लंबे समय से थीं। अगर यह कानून पारदर्शिता लाता है, तो अच्छा है। लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका दुरुपयोग न हो।” वहीं, लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता नाजिया खान ने कहा, “यह कानून मुस्लिम समुदाय को संदेह की नजर से देखता है। यह धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है।”
वक्फ अधिनियम को लेकर उठा यह विवाद केवल कानूनी या राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी गहरे सवाल खड़े कर रहा है। क्या यह कानून वाकई पारदर्शिता लाएगा, या यह समाज में और बंटवारे का कारण बनेगा? यह सवाल समय ही जवाब देगा।
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