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अखिलेश यादव – केशव मौर्य में फिर छिड़ा गेस्ट हाउस विवाद

अखिलेश यादव और केशव मौर्य के बीच कांशीराम को लेकर फिर सियासी जंग छिड़ी
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लखनऊ, 14 अप्रैल 2025: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के वरिष्ठ नेता व उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच तीखी तकरार देखने को मिली। इस बार विवाद का केंद्र बना है दलित नेता कांशीराम और 1995 का कुख्यात गेस्ट हाउस कांड। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर जमकर निशाना साधा, जिससे सियासी माहौल गरमा गया है।

हाल ही में अखिलेश यादव ने एक जनसभा में कांशीराम को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि सपा हमेशा से दलितों और पिछड़ों के हक की लड़ाई लड़ती रही है। उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह कांशीराम जैसे नेताओं के योगदान को कमतर आंकने की कोशिश कर रही है। अखिलेश ने गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करते हुए कहा, “1995 में बीएसपी के कुछ नेताओं ने सपा के खिलाफ हिंसा की थी, लेकिन हमने कभी बदले की राजनीति नहीं की। आज बीजेपी उसी तरह की साजिश रच रही है।”

इसके जवाब में केशव प्रसाद मौर्य ने पलटवार करते हुए अखिलेश पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि सपा का इतिहास दलितों और पिछड़ों के साथ विश्वासघात का रहा है। मौर्य ने गेस्ट हाउस कांड को याद करते हुए कहा, “उस समय सपा की सरकार थी, और कांशीराम जी के साथ जो व्यवहार हुआ, वह सपा की नाकामी थी। आज अखिलेश उस घटना को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जनता सब जानती है।” मौर्य ने यह भी दावा किया कि बीजेपी ही दलितों और पिछड़ों के सच्चे हितैषी हैं, और उनकी सरकार ने इन वर्गों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं लागू की हैं।

अखिलेश यादव और केशव मौर्य के बीच कांशीराम को लेकर फिर सियासी जंग छिड़ी
अखिलेश यादव और केशव मौर्य के बीच कांशीराम को लेकर फिर सियासी जंग छिड़ी

गेस्ट हाउस कांड का जिक्र उत्तर प्रदेश की राजनीति में हमेशा से संवेदनशील रहा है। 1995 में लखनऊ के गेस्ट हाउस में सपा और बीएसपी के गठबंधन टूटने के बाद हिंसक झड़प हुई थी, जिसमें बीएसपी नेताओं पर सपा कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट का आरोप लगा था। इस घटना ने दोनों दलों के बीच गहरी खाई पैदा कर दी, जिसका असर आज भी देखने को मिलता है।
अखिलेश ने अपने बयान में यह भी कहा कि सपा ने कांशीराम के विचारों को हमेशा सम्मान दिया और उनकी नीतियों को लागू करने की कोशिश की। उन्होंने बीजेपी पर तंज कसते हुए कहा, “जो लोग कांशीराम जी के नाम पर वोट मांगते हैं, वे उनकी विचारधारा को नहीं समझते। बीजेपी केवल सत्ता के लिए दलितों का इस्तेमाल करती है।”

दूसरी ओर, मौर्य ने बीजेपी की उपलब्धियों का हवाला देते हुए कहा कि उनकी सरकार ने दलित समुदाय के लिए शिक्षा, रोजगार, और आवास जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया है। उन्होंने सपा पर परिवारवाद और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कहा, “अखिलेश जी को पहले अपने शासनकाल की नाकामियां देखनी चाहिए। सपा ने केवल अपने परिवार को सशक्त किया, न कि समाज के कमजोर वर्गों को।”

इस तकरार ने सोशल मीडिया पर भी जोर पकड़ लिया है। सपा समर्थकों ने अखिलेश के बयान का समर्थन करते हुए बीजेपी पर दलित-विरोधी होने का आरोप लगाया, जबकि बीजेपी कार्यकर्ताओं ने मौर्य के बयान को सही ठहराते हुए सपा को “अवसरवादी” करार दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर छेड़ा गया है, क्योंकि दलित और पिछड़ा वर्ग यूपी की सियासत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि कांशीराम का नाम और गेस्ट हाउस कांड जैसे मुद्दे उठाकर दोनों दल अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। जहां सपा दलितों और पिछड़ों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश में है, वहीं बीजेपी अपने ओबीसी और दलित समर्थकों को एकजुट रखना चाहती है।

इस सियासी जंग का असर यूपी की राजनीति पर कितना होगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है कि कांशीराम और गेस्ट हाउस कांड जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में और सुर्खियां बटोरेंगे।

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Author: bharatkhabar

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