नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई का दौर शुरू हो चुका है। गुरुवार, 17 अप्रैल 2025 को, भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार को अपनी प्रारंभिक प्रतिक्रिया और संबंधित दस्तावेज जमा करने के लिए सात दिन का समय दिया। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि अगली सुनवाई, जो 5 मई 2025 को होगी, तक वक्फ संपत्तियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा और केंद्रीय वक्फ परिषद या राज्य वक्फ बोर्डों में कोई नई नियुक्ति नहीं की जाएगी।
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, जो 8 अप्रैल 2025 को लागू हुआ, ने देशभर में तीखी बहस और विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है। यह कानून लोकसभा और राज्यसभा में क्रमशः 288 और 128 मतों से पारित हुआ था, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 5 अप्रैल को अपनी मंजूरी दी। इस कानून में कई विवादास्पद प्रावधान हैं, जिनमें गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड और केंद्रीय वक्फ परिषद में शामिल करने, ‘वक्फ बाय यूजर’ की अवधारणा को हटाने, और विवादित वक्फ संपत्तियों के मामले में कलेक्टर को व्यापक अधिकार देने जैसे बदलाव शामिल हैं।
सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि यह कानून जनता की शिकायतों और लाखों प्रतिनिधित्वों के जवाब में लाया गया, जिसमें पूरे गांवों सहित विशाल भूमि क्षेत्रों को वक्फ संपत्ति घोषित करने की चिंताएं शामिल थीं। मेहता ने कोर्ट से अनुरोध किया कि कानून पर पूरी तरह से रोक लगाना एक “कठोर कदम” होगा और इस मुद्दे पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है। उन्होंने आश्वासन दिया कि अगली सुनवाई तक कोई वक्फ संपत्ति, चाहे वह ‘वक्फ बाय यूजर’ हो या अधिसूचित, डी-नोटिफाई नहीं की जाएगी।
मुख्य न्यायाधीश खन्ना ने सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि ‘वक्फ ब suất
बाय यूजर’ की अवधारणा को खत्म करना एक गंभीर समस्या होगी, खासकर उन संपत्तियों के लिए जो 100 या 200 साल पहले वक्फ घोषित की गई थीं। उन्होंने पूछा, “14वीं और 15वीं सदी में बनी मस्जिदों के लिए बिक्री विलेख (सेल डीड) की मांग करना असंभव है। हम अतीत को फिर से नहीं लिख सकते।” कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या हिंदू धार्मिक ट्रस्टों में मुस्लिमों को शामिल करने की अनुमति दी जाएगी, जिसके जवाब में बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल ने कहा कि वक्फ बोर्ड एक धार्मिक निकाय नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक और वैधानिक संस्था है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी और राजीव धवन ने तर्क दिया कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 26 (धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार) का उल्लंघन करता है। सिब्बल ने कहा कि गैर-मुस्लिमों को वक्फ परिषद में शामिल करना 20 करोड़ मुस्लिमों की आस्था पर संसदीय अतिक्रमण है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ‘वक्फ बाय यूजर’ को हटाना चार लाख वक्फ संपत्तियों को खतरे में डाल सकता है, क्योंकि इनमें से अधिकांश के पास औपचारिक दस्तावेज नहीं हैं।
कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में इस कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा पर भी चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “यह परेशान करने वाला है कि जब मामला कोर्ट में विचाराधीन है, तब ऐसी हिंसा हो रही है।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह कानून पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाएगा, क्योंकि इसमें कुछ सकारात्मक प्रावधान भी हैं, लेकिन स्थिति को यथावत रखने की आवश्यकता है।
AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी, जिन्होंने इस कानून को “असंवैधानिक” करार दिया, ने कोर्ट के अंतरिम आदेश का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि केंद्रीय और राज्य वक्फ परिषदों का पुनर्गठन नहीं होगा और वक्फ संपत्तियों का मौजूदा दर्जा बना रहेगा। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने भी इस कानून को जल्दबाजी में लाया गया और असंवैधानिक बताया।
छह बीजेपी शासित राज्यों—मध्य प्रदेश, असम, हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़—ने इस कानून के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं। इन राज्यों का तर्क है कि यह कानून वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।




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