संसद बंद करो? निशिकांत दुबे का सुप्रीम कोर्ट पर विवादित तंज
नई दिल्ली, 20 अप्रैल 2025: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना के खिलाफ विवादित बयान देकर देश में एक नया राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। झारखंड के गोड्डा से चार बार के सांसद दुबे ने सुप्रीम कोर्ट पर कानून बनाने का अधिकार छीनने और देश में “धार्मिक युद्ध” भड़काने का गंभीर आरोप लगाया। उनके इस बयान ने न केवल विपक्षी दलों, बल्कि कानूनी हलकों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं उकसाई हैं।
दुबे ने शनिवार को समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा, “अगर सुप्रीम कोर्ट को ही कानून बनाना है, तो संसद और विधानसभाओं को बंद कर देना चाहिए।” उन्होंने सुप्रीम कोर्ट पर अपनी सीमाएं लांघने और देश को “अराजकता” की ओर धकेलने का आरोप लगाया। विशेष रूप से, उन्होंने हाल ही में वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के कुछ प्रावधानों पर सवाल उठाने और सरकार को इन प्रावधानों को लागू न करने का आश्वासन देने के फैसले की आलोचना की।
दुबे ने यह भी दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को वैध करने और आईटी एक्ट की धारा 66ए को रद्द करने जैसे फैसलों के जरिए संसद के अधिकार क्षेत्र में दखल दिया है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 368 का हवाला देते हुए कहा कि कानून बनाने का अधिकार केवल संसद को है, और सुप्रीम कोर्ट का काम केवल कानून की व्याख्या करना है। इसके अलावा, उन्होंने राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समय सीमा तय करने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सवाल उठाया, इसे “संविधान का उल्लंघन” करार दिया।

विपक्ष का तीखा पलटवार
दुबे के बयान पर विपक्षी दलों ने कड़ा रुख अपनाया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने इसे सुप्रीम कोर्ट को कमजोर करने की साजिश का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा, “बीजेपी और उसके नेता संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने में लगे हैं। वक्फ, इलेक्टोरल बॉन्ड और चुनाव आयोग जैसे मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले बीजेपी को रास नहीं आ रहे, इसलिए यह हमला हो रहा है।”
आम आदमी पार्टी (आप) की प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने इसे “घटिया बयान” करार देते हुए मांग की कि सुप्रीम कोर्ट को स्वत: संज्ञान लेते हुए दुबे के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करनी चाहिए। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा ने इसे “अज्ञानी गुंडों” द्वारा शासित भारत का “सबसे निचला क्षण” बताया और इसे सुप्रीम कोर्ट पर “प्रॉक्सी हमला” करार दिया।

कानूनी हलकों में हलचल
सुप्रीम कोर्ट के वकील अनस तनवीर ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर दुबे के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की अनुमति मांगी है। तनवीर ने अपने पत्र में कहा कि दुबे के बयान “बेहद अपमानजनक और खतरनाक रूप से उकसाने वाले” हैं, जो सुप्रीम कोर्ट की गरिमा को कम करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने इसे अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15(1)(बी) के तहत कार्रवाई योग्य बताया।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि दुबे का बयान न केवल सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह न्यायपालिका और विधायिका के बीच संतुलन को भी खतरे में डाल सकता है। कुछ विशेषज्ञों ने इसे “खतरनाक प्रवृत्ति” करार दिया, जहां राजनीतिक नेता अपनी असहमति को व्यक्त करने के लिए न्यायपालिका पर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं।
बीजेपी ने बनाई दूरी
दुबे के बयान से उपजे विवाद के बाद बीजेपी ने तुरंत दूरी बना ली। पार्टी अध्यक्ष और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने देर रात एक्स पर एक बयान जारी कर कहा, “निशिकांत दुबे और दिनेश शर्मा के बयान उनके निजी विचार हैं। बीजेपी इन बयानों से सहमत नहीं है और न ही इन्हें समर्थन देती है। हमारी पार्टी हमेशा न्यायपालिका का सम्मान करती है और इसे लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ मानती है।” नड्डा ने यह भी कहा कि उन्होंने दोनों नेताओं को भविष्य में ऐसे बयानों से बचने की हिदायत दी है।
हालांकि, विपक्ष ने बीजेपी के इस कदम को “नुकसान नियंत्रण” का प्रयास बताया। कांग्रेस नेता मणिकम टैगोर ने कहा, “यह पहली बार नहीं है जब दुबे ने संवैधानिक संस्थाओं पर हमला किया है। बीजेपी की चुप्पी पहले और अब सफाई देना केवल दिखावा है।”
वक्फ संशोधन अधिनियम और विवाद का केंद्र
दुबे का बयान उस समय आया है, जब सुप्रीम कोर्ट वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। 17 अप्रैल को हुई सुनवाई में, सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम के कुछ विवादास्पद प्रावधानों, जैसे ‘वक्फ-बाय-यूजर’ और गैर-मुस्लिम सदस्यों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने पर सवाल उठाए थे। केंद्र सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि अगली सुनवाई (5 मई) तक इन प्रावधानों को लागू नहीं किया जाएगा।

दुबे ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को “अनुचित” बताते हुए कहा कि यह संसद के विशेषाधिकार का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसले, जैसे राम मंदिर और ज्ञानवापी जैसे मामलों में “कागज दिखाने” की मांग, धार्मिक तनाव को बढ़ावा दे रहे हैं।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
दुबे का बयान ऐसे समय में आया है, जब न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच तनाव पहले से ही चर्चा में है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के अनुच्छेद 142 के उपयोग को “लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ परमाणु मिसाइल” करार दिया था। धनखड़ ने भी सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की आलोचना की थी, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर समयबद्ध निर्णय लेने का निर्देश दिया गया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दुबे का बयान बीजेपी के भीतर एक बड़े वर्ग की उस सोच को दर्शाता है, जो न्यायपालिका को कार्यपालिका के अधीन करने की वकालत करता है। हालांकि, बीजेपी की आधिकारिक लाइन इस तरह के बयानों से दूरी बनाए रखने की रही है।
सामाजिक स्तर पर, इस विवाद ने आम जनता के बीच सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और संसद की सर्वोच्चता पर बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर कुछ लोग दुबे के बयान का समर्थन करते हुए कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट को “अति-हस्तक्षेप” से बचना चाहिए, जबकि अन्य इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं।
आगे क्या?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अटॉर्नी जनरल अनस तनवीर के अनुरोध को मंजूरी देते हैं, तो दुबे के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू हो सकती है। इसके अलावा, विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट के अगले कदम पर सभी की निगाहें टिकी हैं, क्योंकि यह मामला न केवल न्यायपालिका की गरिमा, बल्कि भारत के संवैधानिक ढांचे के लिए भी महत्वपूर्ण है।
इस बीच, दुबे ने अपने बयान पर कोई पछतावा नहीं जताया है और कहा है कि संसद अगले सत्र में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को फिर से लाने की योजना बना रही है, ताकि जजों की नियुक्ति में “भाई-भतीजावाद” को खत्म किया जा सके।
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