“देश में बढ़ती बाल तस्करी पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता: ‘यह सामाजिक कलंक, तुरंत कार्रवाई जरूरी'”
देश में बाल तस्करी के बढ़ते मामलों ने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया है। शीर्ष अदालत ने इस गंभीर मुद्दे को “सामाजिक कलंक” करार देते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को तत्काल प्रभावी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से दिल्ली पुलिस को इस मामले में सक्रियता दिखाने और तस्करी के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए ठोस कार्रवाई करने का आदेश दिया है। यह निर्देश एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें देशभर में बच्चों के गायब होने और तस्करी में लिप्त संगठित गिरोहों की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: ‘बच्चों का भविष्य खतरे में’
जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, “बाल तस्करी केवल एक अपराध नहीं, बल्कि हमारे समाज और देश के भविष्य पर हमला है। बच्चों को तस्करी के जाल में फंसने से बचाना हर सरकार और नागरिक की जिम्मेदारी है।” कोर्ट ने गहरी चिंता जताई कि हर साल हजारों बच्चे लापता हो रहे हैं, जिनमें से कई का कोई सुराग नहीं मिलता। अदालत ने राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2023 में 60,000 से अधिक बच्चों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज की गई, जिनमें से कई तस्करी का शिकार हो सकते हैं।

दिल्ली पुलिस को विशेष निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को विशेष रूप से निशाने पर लिया, क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी में तस्करी के कई मामले सामने आए हैं। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को निर्देश दिया कि वे तस्करी के नेटवर्क की गहन जांच करें और तीन महीने के भीतर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करें। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस को उन संगठित गिरोहों पर नकेल कसनी होगी जो बच्चों को देह व्यापार, मजदूरी, और अवैध गोद लेने जैसे अपराधों के लिए तस्करी कर रहे हैं। इसके अलावा, कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि बाल तस्करी रोकने के लिए बनाए गए कानूनों और नीतियों को लागू करने में क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
बाल तस्करी का काला सच
बाल तस्करी के मामले देश के कई हिस्सों में चिंताजनक रूप से बढ़ रहे हैं। तस्कर गरीब और कमजोर परिवारों के बच्चों को निशाना बनाते हैं, जिन्हें बेहतर जिंदगी या नौकरी का लालच देकर फंसाया जाता है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, तस्करी के शिकार बच्चों में 60% से अधिक लड़कियां हैं, जिन्हें अक्सर देह व्यापार के लिए बेच दिया जाता है। इसके अलावा, कई बच्चे अवैध अंग व्यापार, बाल मजदूरी, या जबरन भीख मांगने के लिए तस्करी का शिकार हो रहे हैं। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य पुलिस बलों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के कारण तस्करी नेटवर्क बेरोकटोक काम कर रहे हैं।
सरकार और एनजीओ की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने किशोर न्याय अधिनियम और अन्य तस्करी विरोधी कानूनों के धीमे कार्यान्वयन के लिए केंद्र सरकार को भी फटकार लगाई। खंडपीठ ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को छह सप्ताह के भीतर बचाव और पुनर्वास कार्यों में कमियों को दूर करने के लिए एक विस्तृत कार्य योजना प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इस बीच, बाल अधिकारों पर काम करने वाले कई गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने कोर्ट के हस्तक्षेप का स्वागत किया है। एक एनजीओ प्रतिनिधि ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का निर्देश एक जागृति कॉल है। तस्करी नेटवर्क को खत्म करने के लिए पुलिस, सरकार और नागरिक समाज के बीच बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत है।”
दिल्ली पुलिस की कार्य योजना
कोर्ट के निर्देश के जवाब में, दिल्ली पुलिस ने बाल तस्करी से निपटने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन किया है। यह टास्क फोर्स शहर में तस्करी के हॉटस्पॉट की पहचान करने, छापेमारी करने और अंतरराज्यीय तस्करी नेटवर्क को ट्रैक करने के लिए अन्य राज्यों के साथ सहयोग करेगी। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा, “हम तस्करों पर नकेल कसने और कमजोर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हम पीड़ितों को बचाने और पुनर्वास के लिए एनजीओ और केंद्रीय एजेंसियों के साथ मिलकर काम करेंगे।”
सोशल मीडिया पर जनाक्रोश
बाल तस्करी का मुद्दा सोशल मीडिया पर व्यापक आक्रोश का कारण बना है, जिसमें नेटिज़न्स ने सख्त कानूनों और तेज कार्रवाई की मांग की है। #StopChildTrafficking और #SaveOurChildren जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, जहां उपयोगकर्ता लापता बच्चों की कहानियां साझा कर रहे हैं और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “यह शर्मनाक है कि हर साल हजारों बच्चे तस्करी का शिकार हो रहे हैं, और सिस्टम उन्हें विफल कर रहा है।” एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, “सुप्रीम कोर्ट को धन्यवाद कि उसने यह कदम उठाया। अब पुलिस और सरकार को कार्रवाई करने का समय है।”
सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने भारत में बाल तस्करी की कठोर वास्तविकता पर रोशनी डाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस खतरे से निपटने के लिए सख्त प्रवर्तन, एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय, और जन जागरूकता अभियानों का संयोजन आवश्यक है। कोर्ट ने अगली सुनवाई तीन महीने बाद निर्धारित की है, जहां वह दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार द्वारा की गई प्रगति की समीक्षा करेगा। फिलहाल, इस निर्देश ने कार्यकर्ताओं और लापता बच्चों के परिवारों को यह उम्मीद दी है कि न्याय अंततः मिलेगा।
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